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बद और बदनाम रहा बंद

Posted On: 31 May, 2012 Others में

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31 मई का दिन भारत देश के लिहाज से राजनीतिक आक्रोश को अभिव्यक्त करने का दिन साबित हुआ..पेट्रोल में हुई दामों में बढ़ोतरी के कारण बंद के दौरान भी जगह-जगह आग लगी रही..इलाहाबाद के ट्रेन रोके जाने से शुरु हुए समाचारों की श्रृंखला में धीरे-धीरे मुंबई के मुलुंड में बसों की तोड़फोड़,बैंगलोर में बसों को जलाने की घटना,पुणे में भी तोड़फोड़ समेत दिल्ली में बीजेपी नेताओं और बिहार में जेडीयू नेताओं को गिरफ्तार करने के समाचार जुड़ते गए…अब भी जब ये लेख लिख रहा हूं अब भी बंद के समाचारों ही चैनल्स की सुर्खियां बनी हुई है या ये कहे तो बेहतर होगा कि 31 मई का दिन बंद समाचारों के लिए आरक्षित रहा…..
एनडीए,लेफ्ट,समाजवादी पार्टियों ने बंद का आह्वान किया था..दिल्ली में लाखों लोग जाम फंसे रहे तो ..कई लोगों की रेलयात्रा यादगार बन गई…कुल मिलाकर मीडिया को मसाला मिला,सरकार से इतर दूसरे राजनीतिक दलों को सरकार को घेरने का मौका मिला…और सरकार के खिलाफ होने वाले प्रदर्शनों में एक प्रदर्शन का नाम और जुड़ गया..अभी इस वक्त मेरे पास ऐसे कोई आंकड़ें या जानकारी नही है जिससे ये पता चल सके कि बंद से भारतीय बाजार को कितना नुकसान हुआ है…साथ ही ये भी पता नही चल पाया है कि कितने की सरकारी संपत्ति खाक हुई है…आम लोगों का जो समय खराब हुआ उसकों आंकड़ों में नहीं गिना जा सकता…
सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये है कि इस बंद में आम लोगों ने कितने प्रतिशत योगदान दिया…क्या लोगों ने स्वस्फूर्त होकर बंद में भाग लिया…खैर जिन पार्टियों ने बंद की अगुवाई की उनके कार्यकर्ताओं ने तो बंद को सफल करने में पूरी जद्दोजहद की …
बात एनडीए की….पेट्रोल को बाजार के हवाले का निर्णय किसका था..शायद एनडीए का ,जिसे अमली जामा यूपीए ने पहनाया…तो अब अगर पेट्रोल के दाम बढ़ रहे हैं तो एनडीए को दोषमुक्त कैसे किया जा सकता है…समाजवादी पार्टी यूपी में केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करती नजर आई..और इसके पहले एसपी के मुखिया यूपीए द्वितीय के तीसरे सालाना जलसे में ऐसे नजर आए थे..कि वो यूपीए का अंग ही हो….इसके अलावा जनलोकपाल के लिए आखरी दिन एसपी के सांसद ने ही कमेटी को भेजने का प्रस्ताव रखा था..मतलब एसपी ने समय-समय पर यूपीए को साथ दिया तो सवाल ये कि ये कैसा साथ हैं या ये कैसा विरोध हैं……ममता दीदी और करुणानिधि ने भी 31 मई के पहले अपने-अपने राज्यों में इसी बात पर केंद्र का विरोध किया था…जो कि यूपीए-2 के घटक हैं…अब सवाल ये कि खुद बनाई सरकार का विरोध कितना प्रासंगिक है…और महत्वपूर्ण भी……
देश के इतिहास में बंद होते रहते हैं…इससे आमजनता को क्या मिलता है..ये बड़ा सवाल है…सभी राजनीतिक दल बंद के माध्यम से सरकार के खिलाफ लोगों के आक्रोश या उनकी मजबूरी को सियासी फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं…मैं विरोध करने को गलत नहीं कह रहा हूं..पर बंद के नाम हिंसा,आगजनी,सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान करने ,रेल को रोकने जैसी गतिविधियों का समर्थन भी नही कर सकता…क्या गांधी के देश में विरोध का तरीका हिंसात्मक ही होना क्यों जरूरी है…
अंत में – विरोध हो ..सकारात्मक हो…पर एक निवदेन…कृपया बंद के नाम पर उन आम लोगों को परेशान ना करों जो पहले से ही परेशान हैं….

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